
कहते है यहाँ साब मोह का बंधन है, मोह मे मत pado ,सब माया है और भी बहुत कुछ...............
मगर सोचने की बात ये है की क्या कोई इंसान बीना मोह, माया, साथी, माँ-बाप, भाई-बाहें, रिश्ते-नाते ,प्यार , समाज इन के बीना रह सकता है लोग इश सच को जानते है की सब छोड़ कर जाना है फीर भी जिन्दगी को जीते है माया और मोह मे पड़ कर ही सहीमगर कुछ लोग ऐसे भी होते है तीलक जीनको जिन्दगी मीलती तो है मगेर बीना कीशी हमसफ़र के , बीना कीसी साथी के, उसका कोई नहीं होता , लोग कहते है की जीसका कोई नहीं होता उसका खुदा होता है . अगर खुदा होता है तो क्यों नहीं आता उसके पास , क्यों नहीं उससे बाते करता है, क्यों नहीं उसके दुःख दर्द को बाट लेता है. उसको तनहा क्यों होने देता है .जीसका कोई नहीं होता उसकी कोई मंजील भी नहीं होती , उसको हर रास्ता बेकार नजर आता है.वो जिन्दगी जीता तो है मगेर कीशी उल्लाश और उमंग क बगैर ,आप सोचो उष ज़िन्दगी को जीना कितना मुस्किल होता है. वो इंसाने जीता है किसके सहारे सिर्फ एक उम्मीद सहारे की सायद कल साब ठीक हो जायेगा , कोई सूरज मेरी जिन्दगी मे भी रोसन हो जाये जब की उसको उसकी कोई कीरण भी दूर तक नज़र नहीं आती फीर भी जीता है जीता ही चला जाता हैकोई उम्मीद की कीरण नजर आती भी है तो लपक कर उसको पकड़ना चाहता है,magar उसकी किस्मत मे ख़ुशी कहा , वो कीरण भी उससे आँख बचा केर नीकल जाती है.
एक बार वो इन्सान फीर नीरास हो जाता है फीर अपने दील को सम्हालता है और फीर कोई रोशनी आ जाये सायद की उम्मीद से जीने लगता है जब ज्यादा ही नीरास होता है तो सोचता है कोई बात नहीं तीलक कभी तो अकेले जाने के दीन पुरे होगे कभी तो इश जिन्दगी का सफ़र पूरा होगा चले चलो सायद तुम्हे अकेले ही जिन्दगी की मंजिल तय करनी थी
तुम्हारी किस्मत यही है की तू आया भी अकेला ,जीएगा भी आकेला और जायेगा भी आकेला...
एक बार वो इन्सान फीर नीरास हो जाता है फीर अपने दील को सम्हालता है और फीर कोई रोशनी आ जाये सायद की उम्मीद से जीने लगता है जब ज्यादा ही नीरास होता है तो सोचता है कोई बात नहीं तीलक कभी तो अकेले जाने के दीन पुरे होगे कभी तो इश जिन्दगी का सफ़र पूरा होगा चले चलो सायद तुम्हे अकेले ही जिन्दगी की मंजिल तय करनी थी
तुम्हारी किस्मत यही है की तू आया भी अकेला ,जीएगा भी आकेला और जायेगा भी आकेला...
तिवारी जी आप का स्वागत है। जरा वर्तनी पर ध्यान दें।
ReplyDeleteअच्छी पोस्ट , शुभकामनाएं । पढ़िए "खबरों की दुनियाँ"
ReplyDeleteजिंदगी के बारे में जो भी कहा जाए, सब सच सा लगता है. ज़िंदगी यूं भी है, ज़िंदगी त्यों भी है.
ReplyDeleteअच्छा लगा आपको पढ़कर. जारी रहें.
धीरज,धरम,मित्र अरु नारी,
ReplyDeleteआफ़तकाल परखिये चारी।
रहिमन निज मन की व्यथा मन ही राखो गोय
सुन अठिलेहें लोग सब,बांटि न लेहैं कोय।
तिवारीजी,आप बहुत अच्छा लिख रहे हैं। आभार!
achha likha hai. isi tarh likhte rahiye. shubh kamnaon sahit
ReplyDeleteघर से निकलो तो ज़माने से छुपा कर निकलो ,
ReplyDeleteआहट हो ना ज़रा भी पावँ दबा कर निकलो.
लौट आयें ये खुदा फिर से वापस घर में
कही चलने से पहले अब ये दुआ कर निकलो .
राहें मकतल बनी हैं , तू बेकफ़न न रह जाए
इसलिए हाथ पे पता घर का लिखा कर निकलो .
अपने ही खून के हाथों में हैं खंज़र इसलिए
रोएगा कौन तुझ पे ,खुद को रूला कर निकलो .
ये दौर खून का हैं हवाओं में बह रहे नश्तर
घर के हर शख्स को सीने से लगा कर निकलो
कवि दीपक शर्मा
http://www.kavideepaksharma.com
ब्लाग जगत की दुनिया में आपका स्वागत है। आप बहुत ही अच्छा लिख रहे है। इसी तरह लिखते रहिए और अपने ब्लॉग को आसमान की उचाईयों तक पहुंचाईये मेरी यही शुभकामनाएं है आपके साथ
ReplyDelete‘‘ आदत यही बनानी है ज्यादा से ज्यादा(ब्लागों) लोगों तक ट्प्पिणीया अपनी पहुचानी है।’’
हमारे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।
मालीगांव
साया
लक्ष्य
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कृपया अपने ब्लॉग पर से वर्ड वैरिफ़िकेशन हटा देवे इससे टिप्पणी करने में दिक्कत और परेशानी होती है।
इस नए सुंदर से चिट्ठे के साथ हिंदी ब्लॉग जगत में आपका स्वागत है .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!
ReplyDeleteहिंदी ब्लाग लेखन के लिए स्वागत और बधाई
ReplyDeleteकृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढें और अपने बहुमूल्य विचार व्यक्त करने का कष्ट करें
हिंदी ब्लाग लेखन के लिए स्वागत और बधाई
ReplyDeleteकृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढें और अपने बहुमूल्य विचार व्यक्त करने का कष्ट करें